Poem - Bik Jau
- Gopal Vaishnav

- Sep 23, 2025
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Poem -
बिक जाऊँ तेरे लिए भरे बाज़ार में
ख़रीदार भी बहुत हैं खुले आसमान में।
लगा ले क़ीमत जो तू लगा सके,
ये तो मैं हूँ जो बिक जाऊँ कौड़ियों के भाव में।
क्या करेगी तू मोल मेरा, ये तो बता देना,
कलेजे पर पत्थर रखकर ज़रा हिसाब तो कर देना।
ज़िंदगी बीत जाएगी तेरी मूल चुकाते-चुकाते,
और ब्याज़ चुकाने के लिए अगला जनम लेना।
अनमोल हूँ मैं, तू क्या मुझे बेच पाएगी?
ज़िंदगी की राह पर एक से एक हसीन मिल जाएगी।
एक बार झाँक के देख अपने गिरेबान में,
मुझे बिकता देख तू क्या चैन से सो पाएगी?
-Gopal Vaishnav




Superb Bro!!! Loved it!!!
Beautiful poem