उम्र का तजुर्बा - Poem by Shraddha Thuwal
- Shraddha Thuwal

- Sep 4, 2025
- 1 min read

हम कोयले की शान में जलते
यारों को हीरे की चमक से दिखते हैं
अपने देश में अनजान
परदेस को अपने से लगते हैं ।
यहां शहर की भीड़ में सन्नाटा
घर की खामोशी में शोर है
यहां सवालों के खाली तराजू में
जवाबों का ना कोई मोल है।
यहां हर क्या के पीछे
बस क्यों का ही ज़ोर है।
यहां सपनों की आग में जल के
उस राख से मंजिल बनाते हैं
यहां खिले हुए शरीर के अंदर
आंसू से भीगे मन को समझाते हैं।
यहां हर शौक से समझौता है
और हर आदत से सौदा।
हर रोज़ की मेहनत का हिसाब
यहां अपनी ही ज़िद से लड़कर होता है
रिश्तों की मिठास को ठुकराके
इंसान यहां खुद में रोता है।
-श्रद्धा थुवाल
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