Poem - Nanhi Pholjadiyan
- Dr. Jhumpa Sarkar Mandal

- Oct 19, 2025
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Poem -
।।नन्ही फुलझडियां।।
द्वार के ओट से झांक कर मां बोली,
कहां है वो घर, वो बच्चों की टोली,
त्योहार जिनसे झिलमिलाया करते,
हंसी ठिठोली की फुलझड़ियों से
सबको हंसाया करते,
अपने-पराये का भेद मिटाकर,
आपस में घुल मिल जाते,
इसकी उसकी सब की बातें,
चटकारे लेकर सुनाते,
कहां गये वो खेल निराले,
और उन शरारतों के मतवाले,
गलियां सूनी, सूने घर हैं,
दिये जलाते हाथ भी कम हैं,
मन का आंगन भी है खाली,
उन बिन अब कैसी दिवाली...
उन बिन अब कैसी दिवाली...
Poem by डॉ॰ झुम्पा सरकार




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