Poem - Waqt Ki Rait
- Dr. Jhumpa Sarkar Mandal

- Sep 28, 2025
- 1 min read
Updated: Oct 7, 2025

Poem -
कहीं ना कहीं से तो शुरुआत
करनी पड़ेगी,
तुम्हें मुझसे और मुझे तुमसे बात
करनी पड़ेगी।
यूं ही क्यों गुजर जाने दे जिंदगी के
बेहतरीन पल,
इन्हीं पलों में तो जिंदगी
बितानी पड़ेगी।
दिन, हफ्ते, महीने गुजर जाते हैं
नाराजगी में,
आखिर कब तलक हमें झूठे अभिमान की टोकरी
उठानी पड़ेगी,
कदमभर का ही तो है फ़ासला
दरमियां हमारे,
हमें ही दूरियां मिटाने की हिम्मत
दिखानी पड़ेगी।
इससे पहले की वक्त की लकीरों से मिट जाए
निशां हमारे,
चलो दोस्त, इन लकीरों पर अपनी जिंदगी
सजा लें।
चलो दोस्त, इन लकीरों पर अपनी जिंदगी
सजा लें।
Poem by ©Dr. Jhumpa Sarkar




Wonderful poem
So true....
Beautifully penned 👏