Poem - Fasla
- Dr. Jhumpa Sarkar Mandal

- Oct 7, 2025
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।।फ़ासला।।
नितांत अकेलापन है यहां पर,
एक तन्हाई,
मायूसी,
और खालीपन भी है।
राह धूमिल,
बोझिल,
ओझल सी है।
भरोसा टूटने लगा है–
शराफत,
मेहनत,
किस्मत पर से।
मंजिल है भी,
ऐसा यकीन
फिसलता जा रहा है
रेत-सा,
उंगलियों के बीच से।
दूर क्षितिज में,
एक चमकीला भ्रम है,
मेरे सपनों के शहर का,
और मैं,
मैं अपनी अनंत यात्रा पर हूॅं,
उसे पाने की।
पर फ़ासला है कि
इक कदम भी घटता नहीं है,
सालों चलने के बाद।
— Poem by Dr. Jhumpa Sarkar




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