Poem - Aarzo ki Mehfil
- Kaushika Desai

- Sep 30, 2025
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Poem
आरजूओं की महफिल
बड़े बेजुंबा खड़े रहे
हम आरजूओं की महफिल में,
कैसे कह देते कि
कोई चाह ही नहीं बची
अब इस दिल में ।
ऐसा नहीं कि महोब्बत खत्म हो गई
पर शायद कुछ कमजोर धड़कन ही बची है
अब इस दिल में।
बड़ा दर्द पाल रखा था
सालों से हमने
वक्त ने समझाया ऐसा भी कुछ नहीं रखा
उस ना उम्मीद मंजिल में।
लोग हमें पूछते है
इतना भी क्या गम करना?
पर वे क्या जाने बेजुबान रहने का गम
यूँह आरजुओ की महफिल में।
Kaushika Desai




Beautiful poem