Hindi Poem - Over Thinking
- Chhaya Kumari

- Feb 21
- 2 min read

Poem - OVER थिंकिंग - (ek अनचाहा मेहमान)
दिमाग कहता है
कुछ नहीं है।
दिल कहता है
कुछ तो है…
और मैं?
मैं दोनों के बीच अटक जाती हूँ।
लोग कहते हैं
इतना मत सोचो।
पर सोच को रोकने का
कोई स्विच होता है क्या?
तुम्हें भूलना हो या याद करना,
गलती अपनी हो या किसी और की,
कोई पुरानी बात हो
या सड़क पर गुजरती एक अनजानी परछाईं
हर चीज़
च्यूइंग गम की तरह
दिमाग से चिपक जाती है।
छोड़ना चाहती हूँ,
पर छूटती नहीं।
कभी-कभी तो ऐसा लगता है
जैसे मेरा दिमाग
मुझसे छुपकर जाग जाता है,
और मैं सो भी जाऊँ
तो सोचती ही रहती हूँ।
सुबह उठकर खुद से पूछती हूँ
कल रात क्या इतना ज़रूरी था?
पर जवाब कभी साफ नहीं मिलता।
शायद कुछ भी नहीं था।
शायद सब कुछ था।
ओवरथिंकिंग अजीब है
ये समस्या से ज्यादा
संभावनाओं को जन्म देती है।
जो हुआ नहीं,
उसका डर।
जो हो सकता था,
उसका अफ़सोस।
जो होगा,
उसकी चिंता।
और इन तीनों के बीच
वर्तमान कहीं खो जाता है।
कभी-कभी मन करता है
बस दिमाग से कह दूं
चुप हो जा।
पर फिर सोचती हूँ…
अगर ये सोच भी चली गई,
तो क्या मैं वही रहूँगी
जो अभी हूँ?
शायद नहीं।
इसलिए अब
ओवरथिंकिंग से लड़ती नहीं,
बस उसे अपने पास बैठने देती हूँ।
क्योंकि कुछ दिनों में
वो खुद ही थक जाएगी।
और उस दिन
शायद मैं
थोड़ा हल्का महसूस करूँगी।
— छाया कुमारी




Inner thoughts nicely penned 👍
Ncie poem